हितोपदेश – नीला रंगा सियार

नीला रंगा सियार

हितोपदेश की नीला रंगा सियार की कहानी काफी शिक्षाप्रद है। एक समय वन में कोई गीदड़ नगर के पास घूमते घूमते नील के हौद में गिर गया। बाद में उसमें से निकल नहीं सका। प्रातःकाल अपने को मरे के समान दिखलाकर बैठ गया। फिर नील के हौद के स्वामी ने उसे मरा हुआ जान कर और उसमें से निकाल कर दूर ले जाकर फेंक दिया। हौद के स्वामी के जाते ही वहाँ से वह भाग गया। भागते भागते उसे प्यास लगी। पानी पीने के लिए नदी के किनारे रुका। नदी के जल में जब अपनी परछाई को देखा तो डर गया। उसका तो रंग ही बदल गया था। अब वह नीले रंग का हो गया था।

सियार की प्रभुता

उसने सोचा की मैं अन्य सियारों से उत्तम हो गया हूँ। अब मुझे अपनी प्रभुता स्थापित करनी है। यह सोच कर सियारों को बुलाकर कहा श्रीभगवती वनकी देवीजी ने अपने हाथ से वन राज्य के सभी औषधियों के रस से मेरा राजतिलक किया है। इसलिये आज से मेरी आज्ञा से काम करना होगा। अन्य सियार भी उसको अच्छा वर्ण देख कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करके बोले जो आज्ञा महाराज। इसी प्रकार से क्रम क्रम से सब वनवासियों में उसका राज्य फैल गया। धीरे धीरे सारे जानवर उसे राजा मानने लगे।

अनादर सियारों का

अब बाघ सिंह आदि मंत्री बनकर उसकी सभा में बैठने लगे। अब उसे अपनी सभी में दूसरे सियारों का बैठना अच्छा नहीं लगता था। धीरे धीरे अपनी सभा से सियारों को बाहर कर दिया। सियारों का बहुत अनादर किया। अब सियार दुखी और क्रोध में थे। सियारों के बीच एक बूढ़ा सियार भी था। उसने अन्य सियारों से कहा परेशान मत हो। जैसे इसने अपने नीति और धूर्तता से ये सब पाया है, इसका अंत भी ऐसे ही होगा। क्योंकि ये बाघ आदि, केवल रंग से धोखे में आ गये हैं।

बदला

इसलिए इसे राजा मान रहे हैं। जिससे इसका भेद खुल जाए सो करो। ऐसा करना कि संध्या के समय उसके पास सभी एक साथ चिल्लाओ। फिर उस शब्द को सुन कर अपने जाति के स्वभाव से वह भी चिल्ला उठेगा। सारे सियार चिल्लाये तो रंगा सियार भी चिल्लाया। बाघ जान गया की ये रंगा सियार है। बाघ ने पलक झपकते नीला रंगा सियार का काम तमाम कर दिया।

यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः।
श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्रातयुपानहम् ?

अर्थात जिसका जैसा स्वभाव है, वह सर्वदा छूटना कठिन है, जैसे यदि कुत्ते को राजा कर दिया जाए, तो क्या वह जूते को नहीं चबाएगा ?

सीख

झूठ की उम्र लम्बी नहीं होती।

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